kya 9/11 trasdi zehadion ki ek shaitaan ko slami thi... ?

एक सेकुलर शैतान को श्रधांजलि थी- क्या ९/११ की त्रासदी ?
एल.आर .गाँधी

जेहादिओं ने ९/११ का ही दिन क्यों चुना अमेरीका के वर्चस्व प्रतीक वर्ल्ड ट्रेड सेंटर्स
पर आतंकी हमले के लिए. इस्लामिक जेहादीओं के लिए इस दिन का अपना एक
महत्व है . यह वही दिन था जब पाकिस्तान के संस्थापक मुहमद अली जिन्ना का
इन्तेकाल हुआ था. जिन्ना का मानना था कि पश्चिमी लोकतंत्र प्रणाली
मुसलामानों के हित में नहीं ! गांधीजी जिन्ना को बड़े प्यार से कायद-ए-आज़म
बुलाते थे क्योंकि उनमें गज़ब की तर्कशक्ति थी. ११ अगस्त १९४७ के
संविधानसभा के भाषण के आधार पर कुछ लोग आज भी जिन्ना को सेकुलर माने बैठे
हैं. जिन्ना के जीवन का केवल और केवल एक ही उद्देश्य था और वह था
मुसलमानों के लिए अलग देश और अपने जीवन काल में उस इस्लामिक लोकतंत्र का
सदर बनना . अपने इसी उद्देश्य की पूर्ती के लिए जिन्ना ने भारत के टुकड़े ही
नहीं किये बल्कि लाखों लोगों को मौत के घाट उतारने में भी कोई गुरेज़ नहीं
किया -लाखों लोग घर से बेघर हुए सो अलग. जिन्ना से जब पूछा गया कि इतने
नरसंहार से क्या हासिल तो उन्होंने सारा दोष सेनाओं पर मढ़ दिया और साथ ही
तर्क दिया ' हमारा धर्म हमें सिखाता है कि हमें मौत के लिए सदैव तैयार
रहना चाहिए... एक धार्मिक कारन के लिए शहीद की मौत से अधिक बेहतर एक
मुस्लमान के लिए कुछ नहीं है.
पाक के लोगों ने इस सेकुलर शैतान- पाखंडी को अपना भाग्यविधाता मान लिया
जिसने अपने जीवन में कभी भी सच्चे मुसलमान की किसी भी रिवायत का पालन नहीं
किया. कभी नमाज नहीं अत्ता की और न ही कभी रोज़े रखे. रमजान के पवित्र माह
में नई दिल्ली विधान सभा के बाहर आते सिगरेट पी रहे थे, किसी ने टोका तो
जवाब था मैं पाखंडी नहीं हूँ. मुसलमान होते हुए भी सूअर का मांस बड़े शौक
से खाते थे. अंग्रेजी लिबास और अंग्रेजी शराब के तो वे बेहद रसिया थे. पाक
का अनपढ़ अवाम इस फ्र्राटे दार अंग्रेजी बोलने वाले वाले 'वकील' पर फ़िदा था
और उन्होंने अपना भविष्य आँखे मूँद कर इसके हवाले कर दिया था. जिन्ना तो
विदा हो गए और अवाम आज भी आँखे मूंदे क़यामत का इंतज़ार कर रहा है. एक असफल
राष्ट्र और आतंकिओं की पनाहगाह पाक- गाँधी के कायदे आज़म जिन्ना की ही देन
है.
जिन्ना के अंतिम संस्कार पर मौलाना उस्मानी पाक के लोगों को यह याद करवाना
नहीं भूले कि 'औरंगजेब के बाद वे सबसे महान मुस्लमान थे. अपनी
महत्वकांक्षा की पूर्ती के लिए जिन्ना ने मुस्लिम भारत आन्दोलन के बीज बोए .
धार्मिक कट्टरवाद ने पाकिस्तान को एक असहिष्णु देश में बदल दिया , जिसकी
कि बहुत भारी कीमत चुकानी पड़ी पाक में रह रहे अल्पसंख्यकों को. बंटवारे के
बाद पाक में २२% अल्पसंख्यक जिनमें मुख्यत हिन्दू थे ,रह गए . आज मात्र २%
ही बचे हैं. बाकी सब मज़हबी उन्माद की भेंट चढ़ गए- जेहादियों ने इन्हें
मार दिया या भगा दिया और जो बच गए उन्हें धर्म परिवर्तन कर इस्लाम कबूल
लेने पर बख्श दिया गया. जिन्ना द्वारा नफरत का बोया बीज -मौलवियों द्वारा
निरंतर कट्टरपंथी खाद से सींचा गया और आज विशाल बबूल का पेड़ बन गया है.
जेहादी आतंक से आज इतने लोग इराक और अफगानिस्तान में भी नहीं मारे जाते
जितने कि पाक में. पाक के २०% सुन्नी देओबंदी और बहावी बाकी के मुसलमानों
को 'काफ़िर' मानते हैं . ६०% सुन्नी बरेलवी और १५% शिया जो दरगाहों पर सजदा
करते है और अल्लाह कि इबादत संगीत,कलाम और रक्स से करते हैं .क्योंकि
कुरआन में संगीत हराम है इस लिए काफिरों कि श्रेणी में आते हैं. .रहे बाकी
के बेचारे क्रिश्चन, इस्मईली, हिन्दू, सिख, पारसी, अहमदी ५% ,वे तो काफिर
हैं ही. इस प्रकार जिन्ना के पवित्र पाक में ८०% काफ़िर हैं जिन्हें मौत के
घाट उतारना सच्चे मुस्लमान मोमिन का ईमान है.
पाक के
कट्टर पंथी आतंकिओं को पहले अमेरिका ने अफगानिस्तान में रूस के विरुद्ध
इस्तेमाल किया और धीरे धीरे
पाक के इस असहनशीलता के तर्क ने पूरे विश्व को अपने आगोश में ले
लिया.ओसामाबिन लादेन ने इस्लामिक 'उम्माह' के नाम पर जेहाद को अमेरिका की
ओर मोड़ दिया. सच्चाई तो यह है कि जिन्ना के मुस्लिम भारत आन्दोलन ने
विश्व को मध्यकालीन अवधारणा की अमानवीय विचारधारा की गर्त में धकेल दिया.
आज का मुस्लिम जगत विश्व की २१ वी सदी के विश्व बंधुत्व के सन्देश को
सविकारने से निरंतर कतरा रहा है और प्वाइंट जीरो पर मस्जिद निर्माण की अपनी
मद्यकालीन सोच पर अड़ा है.
जब तक इस सेकुलर शैतान के अनुयायी अपनी मध्य कालीन संकुचित सोच की कुंठा का
परित्याग कर २१वि सदी के विश्व-बंधुत्व के महाभियान के साथ खुद को नहीं
जोड़ते तब तक मानवता के अस्तित्व पर ९/११ का यह दानव इसी प्रकार फन फैलाये
फुंकारता रहेगा. औरंगजेब को महान ..... मानने वाले ये मौलाना मज़हब के नाम
पर जेहादियों को ज़न्नत के ख्वाब दिखा कर 'वर्ल्ड ट्रेड सेंटर' और 'ताज' पर
निशाना मुसलसल साधते रहेंगे.

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डॉ. उमेश पुरी 'ज्ञानेश्वर''

Writer & Editor & Published Hindi Monthly "JYOTISHNIKETAN SANDESH"

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