भारत सरकार ने वर्ष 2004-05 से ही कम से कम विदेशी मदद लेने की नीति बना ली है। विदेशी मुद्रा भंडार की स्थिति अच्छी होने की वजह से सरकार ने अपने विदेशी कर्जो को समय से पहले लौटाना भी शुरू कर दिया है। वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी और पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम इस बारे में कई बार सरकार की पीठ भी थपथपा चुके हैं, लेकिन सरकार के ताजा आंकड़े बता रहे हैं कि वर्ष 2008-09 के ग्लोबल संकट के बाद भारत फिर से विदेशी मदद स्वीकार करने लगा है। वित्त मंत्रालय के 30 जून, 2010 तक के आंकड़ों के मुताबिक इंटरनेशनल बैंक फॉर रिकांस्ट्रक्शन एंड डेवलपमेंट (आईबीआरडी) से वित्तीय मदद हासिल करने वालों में भारत का स्थान पहला है। भारत को आईबीआरडी से वितरित कुल कर्ज का 15 फीसदी हिस्सा मिला है। मेक्सिको 14.4 फीसदी सहायता के साथ दूसरे स्थान पर है। आईडीए की बात करें तो 30 जून, 2010 तक इसने कुल वितरित कर्ज का 17.7 फीसदी भारत को देने का प्रस्ताव स्वीकार किया है। भारत के बाद वियतनाम, तंजानिया, इथोपिया और नाइजीरिया का स्थान है। अन्य देशों व एजेंसियों से प्राप्त मदद को देखें तो साफ हो जाता है कि भारत सिर्फ अमेरिका से आर्थिक मदद लेने में कुछ संकोच करता है। अन्य देशों या एजेंसियों से वित्तीय सहायता लेने में भारत काफी आगे है। इंटरनेशनल फंड फॉर एग्रीकल्चर डेवलपमेंट (आईएफएडीआई) से भारत सबसे ज्यादा मदद हासिल करने वाला देश है। जापान सरकार की ओडीए लोन स्कीम के मामले में भी भारत का स्थान अव्वल है। ब्रिटेन की डीएफआईडी और जर्मनी (केएफडब्ल्यू) से वित्तीय मदद लेने में भी भारत अग्रणी है। यूरोपीय संघ से मदद लेने में भारत एशिया में दूसरे स्थान पर हैं। एशियाई विकास बैंक (एडीबी) से आर्थिक सहायता हासिल करने वालों में भारत तीसरे नंबर है। वर्ष 2005-06 में भारत के कुल बजटीय व्यय का 3.4 फीसदी विदेशी मदद के जरिए हासिल किया गया था। यह वर्ष 2009-10 में घट कर 2.5 फीसदी रह गया है। इसी तरह से सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की तुलना में विदेशी मदद की हिस्सेदारी इस दौरान 0.5 फीसदी से घटकर महज 0.4 प्रतिशत रह गई है। लेकिन चालू वित्त वर्ष में बैंकिंग पुनर्गठन के लिए मिल रही विश्व बैंक की मदद इस आंकड़े को पलट सकती है।
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