नई दिल्ली. प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने स्पष्ट कर दिया है कि गरीबी को स्थायी बनाकर पर्यावरण का संरक्षण नहीं किया जा सकता। देश की खनिज सम्पदा का दोहन किए बगैर विकास के रास्ते पर आगे नहीं बढ़ा जा सकता। प्रधानमंत्री ने साथ ही यह भी साफ कर दिया कि सरकार अनाज की बर्बादी को लेकर सुप्रीम कोर्ट की भावनाओं का सम्मान करती है, पर निश्चित ही खाद्यान्न को मुफ्त में वितरित नहीं किया जा सकता। प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट को सरकार के नीति निर्धारण संबंधी मामलों में नहीं पड़ना चाहिए।
सोमवार को देश के कुछ चुने हुए संपादकों के साथ अपने निवास पर चर्चा में प्रधानमंत्री ने नक्सलवादियों की हिंसा को देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती बताया। उन्होंने कहा कि कानून को अपने हाथों में लेने की किसी को इजाजत नहीं दी जा सकती। डॉ. मनमोहन सिंह ने इस सिलसिले में गृह मंत्री पी. चिदंबरम की खुलकर तारीफ की। कहा, ‘वे बहुत अच्छा काम कर रहे हैं और उन्हें मेरा पूरा समर्थन है।’
डॉ. मनमोहन सिंह ने कहा कि नक्सलवादियों की हिंसा से वे ही राज्य सबसे ज्यादा प्रभावित हैं जो खनिज सम्पदा से सम्पन्न हैं। जब तक इस सम्पदा का सही तरीके से दोहन नहीं होता, देश तरक्की के मार्ग पर आगे नहीं बढ़ सकता। नक्सलवाद की समस्या इतनी बड़ी है कि कोई अकेली राज्य सरकार अपने ही बूते पर उससे नहीं निपट सकती। केंद्र सरकार की मदद उसके लिए आवश्यक है। प्रधानमंत्री ने कहा कि आप शून्य में विकास की बात नहीं कर सकते।
सम्पदा का उत्पादन किए बगैर गरीबी नहीं मिटाई जा सकती। पर्यावरण संरक्षण संबंधी चिंताओं का विकास की चिंताओं के साथ सामंजस्य होना चाहिए। हम देश को फिर लाइसेंस-परमिट राज के युग में नहीं ले जा सकते। प्रधानमंत्री ने कहा कि वे शीघ्र ही पेट्रोलियम, कोयला, सड़क, परिवहन और वन मंत्रालयों से जुड़े मंत्रियों की बैठक बुला रहे हैं, ताकि पूरे मसले पर एक साथ विचार हो सके। प्रधानमंत्री ने कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी के इस विचार से सहमति जताई कि देश में दो तरह के भारत मौजूद हैं। ऐसा इसलिए है कि कृषि और गैर-कृषि व्यवसायों में लगे लोगों की आय के बीच बहुत फर्क है, जो कि अस्थिरता पैदा करने वाला है।
प्रधानमंत्री ने एक सवाल के जवाब में यह भी कहा कि दीर्घकालीन विकास की दृष्टि से देश में औद्योगीकरण का बढ़ना जरूरी है, ताकि गरीब सिर उठाकर जी सकें। कृषि उत्पादन में वृद्धि के जरिए केवल सीमित अवसरों की प्राप्ति हो सकती है।
खुले में सड़ने वाले अनाज के वितरण को लेकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा की गई टिप्पणी पर प्रधानमंत्री ने कहा कि एक अनुमान के अनुसार देश में कोई 37 प्रतिशत आबादी गरीबी की रेखा के नीचे जीवनयापन करती है। उन्होंने पूछा कि आबादी के इतने बड़े हिस्से को मुफ्त में अनाज कैसे बांटा जा सकता है? रियायती दरों पर उसे अवश्य ही बांटा जा सकता है। इसके लिए सरकार इश्यू मूल्य तय कर चुकी है। प्रधानमंत्री ने कहा कि अनाज के मुफ्त में वितरण का विचार किसानों को अधिक खाद्यान्न उत्पन्न करने से हतोत्साहित करेगा।
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