आरक्षण एक बहुत खतरनाक शब्द हो गया है। हो तो बवाल, न हो तो और अधिक बवाल। इस नाम का फिल्म बनाना, इस नाम पर किताब लिखना खतरे से खाली नही है , सो इस नाम से ब्लाग लिखने से मै जरा भयाक्रांत तो हूँ ही। इस मनोदशा से मै कुछ लिखने का प्रयास कर रहा हूँ,भगवान मेरी रक्षा करे। प्रारम्भ मे ही गोस्वामी तुलसी दास की तरह ,"बन्दौँ संत,असंज्जन चरणा " कह कर बीच मे रहते होए,दोनो ध्रुवोँ को प्रणाम करता हूँ,कृपया आशिर्वाद देँ।
बहुत पहले,जब पहली बार मुझे इलाहाबाद से दिल्ली जाना हुआ तो मालुम पड़ा कि ट्रेन मे जगहे कम और यात्री ज्यादा हैँ
।स्वाभाविक प्रश्न पैदा हुआ कि कौन-कौन जाँय, और कौन-कौन रुक जाँय।रिजर्वेशन फार्म लिया,उसमे अपना कच्चा चिठ्ठा खोला और दिल्ली जाने के जज्बे मे पहली बार "आरक्षण" से रूबरू हुआ। दूसरी बार इस "आरक्षण" से फिर रूबरू होना पड़ा,पर जरा हट के, जब दिल्ली के एक बड़े रेष्ट्राँ मेँ,कुछ मित्रोँ के साथ,भोजन करने का प्लान बना। हुआ यूँ कि, एक फिल्म हम लोगोँ ने देखी थी जिसमे,हीरो अपनी एक खूबसूरत महिला मित्र के साथ एक बड़े से रेष्ट्राँ मे भोजन करता है,सीन कुछ इस तरह है कि, सामने महिला मित्र और बगल मे बड़े से सीसे वाली खिड़्की से दिखता है बाहर का खूबसूरत नजारा। भोजन करने का यह सीन बहुत लुभावना लगा। हम लोगोँ के मुँह से भी लार टपका। महिला मित्र तो मिलनी मुश्किल थी, बिचार किया गया कि बाकी का सीन तो दुहराया जा सकता है। रेष्ट्राँ तो तय हो गया, प्रश्न् पैदा हुआ कि सीसे वाली खिड़्की से सटी सीट कैसे मिले,वैसे तो रेष्ट्राँ मे काफी जगह होती है, कहीँ भी बैठ कर खाया जा सकता है,पर बात रही फिल्म वाले सीन की,सो जायके के लिये तो वैसी ही सीट मिलनी जरूरी थी।रेष्ट्राँ मैनेजर को फोन किया गया और "आरक्षण" कराया गया।
अब, जब मै बिचार करता हूँ तो पाता हूँ कि "आरक्षण" के दोनो दीदार मेँ बहुत बड़ा अंतर है।पहले वाले मे बड़ा झमेला है, इस तारीख मे जाओ,इस वाले नही उस वाले क्लास मे जगह है,वी.आई.पी. कोटा मिल सकता है,सिफारिस करवाओ,इत्यादि,इत्यादि। दूसरे मे कोई तुक्का फजीहत नही। बस फोन करो और समय बताओ,इस रेष्ट्राँ मे नही तो दूसरे मे सही,फिर राजा की तरह जाओ और जो मर्जी हो खाओ। हाँ,अपना जेब देख कर।
यह दूसरे वाला "आरक्षण" बड़ा मजेदार है। मेरा वश चले तो यही लागू करवाया जाय।
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