वास्तु शास्त्र का मतलब यह है की, गृह निर्माण की कला को वास्तु कला कहते है, यह एक शास्त्र है और यह शास्त्र हमें प्रदान करता है ज्ञान , गृह में रहने के लिए उपयुक्त उर्जा ,सकारात्मक वायु , स्वक्ष जल, आकाश , और वो भूमि खंड जहा हमें निवास करना है । इन पांचो तत्वा का जिस भवन में परिपूर्ण समावेश हो वो वास्तु के दृष्टि से अत्ति उत्तम माना जाता है । वास्तु एक ऐसी कला है जो भवन निर्माण के लिए उसका उपयोग किया जाता है । अगर वास्तु का इतिहास अगर देखा जाए तो त्रेता युग में लंका हो या द्वापर में इन्द्रप्रस्थ या हस्तिनापुर या खुद भगवान् कृष्ण के लिए द्वारका का निर्माण किया गया था उसके बाद वास्तु कला का नमूना देखे तो चाहे मुग़ल हो या बोध धरम हो या राजस्थान के भवन या रोमन कला मतलब अंग्रेजो की भवन कला ,,वास्तु के हिसाब से ही भवन क्यों बनाया जाए इस्सका आखिर क्या प्रभाव पड़ता है मनुष्य के जीवन पर ..साफ़ तौर पर है जाहिर है की एक मनुष्य को स्वस्थ रहने के लिए वायु,जल,सूर्य की रौशनी,खुला आसमान,और अग्नि और भूमि की एक हिस्सा चाहिए और वास्तु से हमें दिशा का ज्ञान की कौन की दिशा हमारे लिए कितना अच्छा रहता है और क्यों रहता है ,किसी भी मनुष्य के जीवन पर सूर्य के रौशनी का प्रभाव बहुत महत्व पूर्ण होता है लेकिन सूर्य की रोशनी किस दिशा में हमें क्याप्रभाव देगा अगर उसके ऋणात्मक प्रभाव को कैसे समाप्त हो और उर्जात्मक प्रभाव कैसे प्राप्त किया जाए , सूर्य पूर्व से उदय होता है और पूर्व से दक्षिण से यात्रा करते हुए पछिम में जा कर उनकी रोशनी अस्त होती है तथा पश्चिम से उत्तर होते हुए पूर्व में फिर उदयमान होता है सूर्य ,और वर्ष भर में सूर्य उत्रायण से दक्षीणआयन और दक्षिणायन से उत्रायण की यात्रा करते हुए १२ राशियों की परिक्रमा करते है तो इनका प्रभाव से ऋतुओ का आगमन तथा उनका प्रभाव मनुष्य पर जरूर पड़ता है तथा दिशा के हिसाब से पूरब पश्चिम की दिशा अत्ति महत्वपूर्ण माना जाता है । उत्तर और दक्षिण की दिशा का महत्व धरती के उत्तरी तथा दक्ष्णि ध्रुवो के प्रभाव से सम्बन्ध है ,उत्तरी ध्रुव से चुम्ब्किये किरने दक्ष्णि ध्रुव की और जाती है और इन किरणों का प्रभाव हम पर पड़ता है तथा ये सूर्य के प्रभाव के भांति लाभ प्रद होते है । वास्तु शास्त्र इन उर्जा से लाभ उठाने के लिए भवन निर्माण का निर्देश देता है । वास्तु में सबसे महत्वपूर्ण है दिशा जैसे : पूर्व(सूर्य), पश्चिम(शनि), उत्तर (बुध) ,दक्षिण (मंगल), दक्षिण पूर्व अग्नये कोण (शुक्र ) ,दक्षिण पश्चिम या नैत्रित्य कोण ( राहू), उत्तर पश्चिम या व्यवया कोण ( चंद्रमा ), उत्तर पूर्व अर्थात ईशान कोण ( गुरु ) अर्थात इन ८ दिशाओं का वास्तु में अत्ति महत्व है , इन दिशा चयन तथा इन के अनुशार भवन निर्माण को वास्तु कला मानते है और इन दिशा के स्वामी अपने अनुसार ही प्रभाव डालते है और स्वस्थ्य जीवन सुखमय जीवन के लिए इन रहस्य को समझना बहुत जरूरी है । तथा यह जानकारी हमें वास्तु शास्त्र से ही प्राप्त हो सकता है ।

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डॉ. उमेश पुरी 'ज्ञानेश्वर''

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