गंगाप्रेमी निगमानंद के बलिदान पर राजनीति क्यों

 

राजेश त्रिपाठी

भारत की जीवनरेखा पावन सुरसरि जिन्हें हम श्रद्धा से गंगा मैया कह कर पुकारते हैं की रक्षा के लिए 115 दिनों से अनशनरत स्वामी निगमानंद की सोमवार 13 जून को कोमा की अवस्था में हुई मौत अपने पीछे कई सवाल छोड़ गयी है। इस गंगाप्रेमी युवा स्वामी का खामोश बलिदान समाज और सत्ता में बढ़ती असंवेदनशीलता की ओर  तो प्रश्न उठाता ही है, इससे सरकार की एक संवेदनशील मुद्दे के प्रति उदासीनता भी उजागर होती है। एक तरह से कहें तो इस बलिदानी का  उपेक्षित बलिदान उन सबकी ओर उंगली उठाता है जिनके हृदय में न इस निस्वार्थ संन्यासी की जिंदगी बचाने की चिंता थी और न ही उसके उस मुद्दे के प्रति गंभीरता से सोचने की जिसके लिए उसने अपने प्राणों की आहुति दी। निगमानंद ने अपने प्राण उस मां गंगा की रक्षा और क्षेत्र के क्षेत्र के पर्यावरण रक्षा हित दिये जो हमारे देश भारतवर्ष की जीवनरेखा है। गंगा की छाती पर धड़धड़ाते ट्रकों और उसके गिर्द चलते अवैध खनन से मर्माहत इस स्वामी ने 19 फरवरी को अपना आमरण अनशन प्रारंभ किया। उद्देश्य था भारत की संस्कृति की पहचान, इसकी जीवनरेखा मां गंगा को अवैध खनन से होते नुकसान से बचाना। गंगा महज एक नदी नहीं यह हमारे देश की संस्कृतियों की संवाहक और देश की पहचान है। जन्म से लेकर मृत्यु तक व्यक्ति का मां गंगा से अभिन्न नाता है। हमारे देश की मान्यता है की मां गंगा मोक्षदायिनी हैं। लेकिन पश्चिमी संस्कृति के रंग में डूबे समाज के एक अंश के लिए तो शायद यह महज एक नदी है। यह धारणा एक तरह से आत्मघाती और विनाशक है।

      मां गंगा की रक्षा के लिए प्राण त्यागने वाले निगमानंद भी हिमालयन इंस्टीट्यूट आफ मेडिकल साइंसेज (हिम्स) में चिकित्साधीन थे। एक त्यागी सत्य संकल्पवान स्वामी धीरे-धीरे खामोश मौत की ओर बढ़ रहा था लेकिन निर्दयी राजनेताओं या संत समाज के पास उससे मिलने या उसकी जान बचाने की कोशिश करने का समय नहीं था। शायद इसलिए कि उसके पीछे न तो करोड़ों का समर्थन था और न ही तामझाम। उसे वह मीडिया हाइप भी नहीं मिली जो दूसरे आंदोलनों को मिली। निगमानंद का उद्देश्य किसी भी आंदोलन से महान और आवश्यक था। गंगा के साथ जिस तरह से ज्यादती हो रही है वह संस्कृतियों और धर्म, आस्था के केंद्र रहे इस देश के लिए शर्म की बात है। गंगा के दामन में आज जहर घोला जा रहा है और यह धीरे-धीरे प्रदूषित से और प्रदूषित होती जा रही है। आज स्थिति यह है कि अगर इसके उद्गम क्षेत्र और हरिद्वार को छोड़ दें तो दूसरी कई जगह इसका पानी मनुष्यों की कौन कहें पशुओं के पीने और उन्हें नहलाने के लायक नहीं रहा। आज नहीं तो कल जब गंगा अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रही होगी, इस देश को अपनी गलती का एहसास होगा लेकिन तब बहुत देर हो चुकी होगी। आज गंगा को स्वच्छ करने के अभियान के लिए करोड़ों रुपयों झोंके जा रहे हैं लेकिन उनसे कितना काम हुआ है यह सभी जानते हैं। अगर हमने पहले से गंगा से श्रद्धा की होती, इसमें गलीज न घोला होता तो यह सुरसरि हमें आज भी अमृत का दान दे रही होती।

 निगमानंद गंगा के अमृतमय रूप को बचाना चाहते थे। वह चाहते थे कि इसके आसपास का पर्यावरण उसी प्राकृतिक स्थिति में अक्षुण्ण और सुरक्षित रहे जैसा वह सदियों से रहा है लेकिन गंगा की बांहों स्वरूप घाटियों के पहरेदार पहाड़ों को कुचल रहे लोगों को तो सिर्फ और सिर्फ पैसे से मतलब था। उनके लिए गंगा का क्या महत्व? उनके क्रशर गंगा की छाती पर चलते रहे, ट्रक गंगा की बांहों को रौंदते रहे और यह बात इस युवा संन्यासी के मन को सालती रही। आखिरकार उसने मां गंगा को बचाने के लिए आत्मत्याग करने का निश्चय किया। हरिद्वार के कनखल क्षेत्र में स्थित मातृ सदन के इस संन्यासी ने गंगा के लिए आत्म बलिदान कर वह किया जो बिरले ही कर पाते हैं। हरिद्वार और देश में ही गंगा को बचाने का दंभ भरनेवाले इसके लिए कुछ भी करने की कसम खाने वाले हजारों हैं लेकिन किसी के पास भी निगमानंद के पास जाकर उनकी रक्षा और गंगा-रक्षा के उनके संघर्ष में खड़ा होने का आश्वासन देने का वक्त नहीं था। तमाम विभूतियां  उसी अस्पताल में पहुंची जहां निगमानंद थे, जाहिर है उन्हें उनके उदेश्य की खबर भी मिली होगी लेकिन वे वहां नहीं गये। राजनेता आज निगमानंद की मौत को भुनाने की कोशिश में हैं। आज सत्ता और विपक्ष इस ताक में हैं कि इस संन्यासी की मौत को किस तरह भुनाया जाये। कैसे इसे अपने पक्ष और विपक्ष के खिलाफ किया जाये। इसके चलते एक-दूसरे पर दोषारोपण किया जा रहा है। किसी को स्वामी के उस उदेश्य से कुछ भी लेना-देना नहीं जो इस राष्ट्र और सरकारों का होना चाहिए। चाहे जिस भी दल की सरकार रही हो कभी किसी ने गंगा रक्षा को गंभीरता से लिया हो ऐसा नहीं लगता। अब उत्तराखंड की सरकार अपने को निर्दोष बताने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रही। स्वामी की मृत्यु की वजह पर भी तरह-तरह की बातें कही जा रही हैं जिसमें एक खबर यह भी सुनने में आ रही है कि उनके रक्त में जहर पाया गया। कहा यह जा रहा है कि स्वामी को कोई ऐसा इंजेक्शन किसी नर्स ने दिया जिसमें कीटनाशक था जो उनके रक्त में पाया गया। रक्त की जो जांच पहले करायी गयी थी कहते हैं कि उसमें इस बात की पुष्टि हुई है लेकिन बाद उत्तराखंड सरकार ने कहा कि स्वामी को जहर देने की जो खबर उड़ायी गयी है वह सच नहीं है। सरकार का दावा है कि पोस्टमार्टम से इसकी पुष्टि नहीं हुई। स्वामी की मौत के बारे में स्पष्टीकरण देते हुए उत्तराखंड के मंत्री मदन कौशिक ने संवाददाताओं को बताया कि स्वामी की मौत 42 दिन तक कोमा में रहने और इसके बाद उनके मस्तिष्क में संक्रमण हो जाने के कारण हुई। उनके शरीर में जहर का कोई चिह्न या लक्षण नहीं थे।

मातृसदन के स्वामी शिवानंद जी ने ही पहले निगमानंद को जहर देने की बात कही थी। कहा यह भी जा रहा है कि बिहार के दरभंगा में निगमानंद स्वामी के पिता सुभाष चंद्र झा, दादा सूर्य नारायण झा और दादी जयकली देवी ने इस मामले में पटना में बिहार के गृह विभाग के प्रमुख सचिव आमिर सुभानी और डीजीपी नीलमणि से मुलाकात की। उन्होंने मामले की पूरी जांच कराने की मांग की है। उन्होंने इस मामले में उत्तराखंड सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि सरकार की असंवेदनशीलता साफ जाहिर है कि देहरादून के उसी अस्पताल में किसी को सारी सुविधाएं उपलब्ध कराई गईं, लेकिन निगमानंद को मरने के लिए छोड़ दिया गया। 
उन्होंने मांग की कि स्वामी निगमानंद के शव को उनके गांव लाया जाए क्योंकि वे वहीं उनका दाह संस्कार करना चाहते हैं। उन्होंने मांग की कि बिहार की सरकार भी इस मुद्दे पर उत्तराखंड सरकार से बात करे।34 साल के स्वामी निगमानंद गंगा के किनारे हो रहे अवैध उत्खनन के विरोध में 19 फरवरी 2011 से अनशन पर थे। जिला प्रशासन ने उन्हें जबरन अस्पताल में भर्ती करा दिया था।

 उत्तराखंड के मंत्री मदन कौशिक का दावा है कि सरकार ने स्वामी से अनशन तोड़ने का आग्रह किया था लेकिन वे अपने निश्चय पर अडिग रहे। उन्होंने इस बात का साफ तौर पर खंडन किया कि उत्तराखंड सरकार की अवैध खनन करने वालों से सांठगांठ थी। उधर केंद्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश का दावा है कि उन्होंने उत्तराखंड में अवैध खनन बंद कराने के उद्देश्य से राज्य सरकार को पत्र लिखा था और उस पर कार्रवाई करने को कहा था। रमेश का दावा है कि राज्य सरकार ने पत्र मिलने के 18 माह बाद तक कोई कदम नही उठाया। जयराम रमेश का कहना है कि जनवरी 2010 से उन्होंने कई बार उत्तराखंड सरकार को अवैध खनन के खिलाफ कदम उठाने के लिए बार-बार चेताया लेकिन उसने ध्यान नहीं दिया। उत्तराखंड सरकार अपनी ओर से सफाई दे रही है। दोष किसका है यह आज नहीं तो कल साफ हो जायेगा लेकिन सबसे बड़ा दोष समाज के उस वर्ग का है जो किसी के लिए तो सुविधा और समर्थन का अंबार लगा देता है और किसी को खामोश अनाम मौत मरने को छोड़ देता है। निगमानंद एक महान उद्देश्य के लिए प्राण त्याग गये अब राजनेता और सत्ताधारी एक-दूसरे की ओर उंगली उठाने और इस बलिदान से उठने वाले सवालों से खुद को बचाने की कोशिश में लग गये हैं।

      निगमानंद की मृत्यु का दोषी हर वह व्यक्ति है जो गंगा को दूषित करने का अपराधी है, जो गंगा और उसके क्षेत्र का अवैध दोहन कर रहा है। भारत की इस जीवनरेखा को तिल-तिल सूखने को विवश कर रहा है। निगमानंद अगर गंगा को बचाने के लिए कृतसंकल्प थे और उन्होंने इसके लिए ही बलिदान किया तो यह तप वे व्यक्तिगत हित के लिए तो कर नहीं रहे थे। राष्ट्र और समाज के हित में स्वामी ने अनशन शुरू किया था। यह पूरे राष्ट्र और हर वर्ग का कर्तव्य था कि वह उनके पक्ष में खड़ा होता, उन्हें बचाता और उनके नेतृत्व में गंगा रक्षा का अहिंसक समर जारी रखता। गंगा आज प्रदूषित हो रही है तो इसके पीछे भी तो भ्रष्टाचार ही है। बिना अधिकारियों की शह के औद्योगिक इकाइयां गंगा में जहर नहीं घोल पातीं। गंगा में जिन उद्योगों का औद्योगिक कचड़ा जाता है उनके लिए अनिवार्य है कि वे वाटरट्रीटमेंट प्लान लगायें ताकि उनके उद्योग का कचड़ा साफ होकर शुद्ध पानी ही गंगा में मिले। ऐसी कई औद्योगिक इकाइयां आज भी मिल जायेंगी जिन्होंने इस नियम का पालन नहीं किया। जाहिर है ये भ्रष्ट अधिकारियों की शह और समर्थन पाकर चल रही हैं। वैसे आशा की एक किरण जगी है। न्यायालय के कड़े आदेश के बाद अब ऐसी कुछ इकाइयों को बंद करने के लिए कदम उठाये जाने की खबरें मिली हैं जो गंगा को प्रदूषित कर रही हैं। हमारा हिंदुस्तान जाग जाये, गंगा को खत्म होने से पहले बचा ले इससे शुभ और पुनीत उद्देश्य भला और क्या हो सकता है।

 निगमानंद का संघर्ष भी उस भ्रष्टाचार के खिलाफ था जो गंगा के पर्यावरण संतुलन को बिगाड़ रहा है। एक तरफ भ्रष्टाचार की मुहिम के खिलाफ आवाज उठाने वालों के खिलाफ पूरा देश खड़ा है और एक ओर हरिद्वार में एक स्वामी महत उद्देश्य के संघर्ष में खामोश मौत को प्राप्त हुआ। क्या बिडंबना है। क्या हो गया है इस समाज और सत्ता के ठेकेदारों को । ये दोहरे मापदंड हमारे समाज को कहां ले जायेंगे। मानव मूल्यों के इस ह्रास इस क्षरण का अंत कब होगा। कब हम सच्चे और महत उद्देश्यों की उपेक्षा करना बंद करेंगे। कब वह दिन आयेगा जब निगमानंद जैसे स्वामियों को इस तरह अपनी जान गंवाने को मजबूर नहीं होना होगा।

 निगमानंद की मृत्यु पर उठे विवाद के मुद्दे पर हरिद्वार के डीएम मीनाक्षी सुंदरम ने इस पूरे मामले में जिला प्रशासन की लापरवाही से इंकार किया है। उन्होंने कहा कि कोर्ट ने अवैध उत्खनन पर रोक लगाने से इंकार कर दिया था और स्वामी से इस मुद्दे पर बातचीत करना, कोर्ट की अवमानना होती। लेकिन वे स्वामी को अनशन तोड़ने के लिए लगातार मना रहे थे।
स्वामी के सहयोगियों द्वारा निगमानंद की मौत के पहले लिखाई गई प्राथमिकी और मेडिकल रिपोर्ट की मानें तो यह किसी गहरी साजिश का नतीजा लगता है। प्रशासन ने मौत की सीबी सीआईडी जांच के आदेश दे दिए हैं। वैसे दबाव के चलते अब उत्तराखंड सरकार सीबीआई जांच तक के लिये तैयार दिखती है।

      कांग्रेस और भाजपा (जिसकी उत्तराखंड में सरकार है) निगमानंद की मृत्यु पर एक-दूसरे को घरेने की कोशिश में हैं। इस बलिदान को अपनी-अपनी सुविधा के लिए ये दल राजनीतिक रंग देने का घिनौना खेल खेल रहे हैं। गंगा के आसपास अगर अवैध खनन हो रहा है तो उसे रोकने के लिए विशेष कदम क्यों नहीं उठाये जा रहे । क्या केंद्र सरकार इसके लिए खुद कोई कदम नहीं उठा सकती। अगर केंद्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश खुद कहते हैं कि उनके आदेश की राज्य सरकार ने उपेक्षा की तो क्या केंद्र सरकार के पास ऐसा कोई अधिकार या शक्ति नहीं कि वह कड़ी कार्रवाई कर गंगा की रक्षा करे? गंगा के आसपास अवैध खनन को रोकना जरूरी है और इसके लिए गंगा स्वच्छीकरण या गंगा बचाओ अभियान के तहत विशेष कानून बना कर ऐसी कोई भी हरकत क्या केंद्र नहीं रोक सकता जो गंगा को या उसके पर्यावरण को नुकसान पहुंचाती हो। माना कि खनन राज्य का मामला है लेकिन जहां तक गंगा के किनारे खनन का प्रश्न है इसे क्या अलग और अनिवार्य रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। ये और ऐसे कई सवाल अपने पीछे छोड़ गया है निगमानंद का बलिदान। एक भगीरथ गंगा को धरा पर लाये थे आज के इस भगीरथ ने उसकी रक्षा में अपने प्राण त्याग दिये। इस कृत्घ्न राष्ट्र को इस महान बलिदानी का ऋणी होना चाहिए जिसने उसकी जीवनरेखा की रक्षा में अपने प्राण त्याग दिये। अगर इस देश के समाज में बलिदानों की महत्ता को समझने की शक्ति मरी नहीं, यह एक मृत और असंवेदनशील राष्ट्र नहीं तो निगमानंद की मृत्यु व्यर्थ नहीं जायेगी। आज नहीं तो कल हम गंगा की रक्षा के लिए कृतसंकल्प होंगे और जिस तरह भ्रष्टाचार के विरोध में राष्ट्रव्यापी आंदोलन का माहौल आज बना है मां गंगा की रक्षा के लिए भी उसी तरह का राष्ट्रव्यापी अभियान शुरू होगा जो अपनी सच्ची परिणति को प्राप्त होगा। गंगा को उसका प्राप्य सम्मान उसी दिन प्राप्त होगा। यह जितना जल्द हो भारत और भारतवासियों के लिए उतना ही अच्छा है। निगमानंद के बलिदान को शत-शत नमन और उन तत्वों को असंख्य धिक्कार जिनके चलते उन्हें मृत्यु का वरण करना पड़ा।

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