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MADAN GOPAL LADHA's Discussions

लोक के आलोक : नानूराम संस्कर्ता

Started Nov 24, 2011 0 Replies

लोक के आलोक : नानूराम…Continue

सवाल..

Started Aug 26, 2011 0 Replies

निश्चय ही अन्ना जी ने देश को इस गंम्भीर मुद्दे पर जगाया है मगर जब देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ़ लोगों में इतना ज्यादा आक्रोश है तब इतना भ्रष्टाचार क्यों है. आर्थिक भ्रष्टाचार के साथ अन्य रूपों पर भी…Continue

जान बचाना बन गया जीवन का मकसद

Started this discussion. Last reply by Ashok Kumar Singh Mar 27, 2011. 1 Reply

जहांचाह होती है वहां…Continue

लोक के आलोक : नानूराम संस्कर्ता

Started Nov 25, 2010 0 Replies

लोक के आलोक : नानूराम संस्कर्ता                                    (पुण्यतिथि २५ नवम्बर पर विशेष)आधुनिक राजस्थानी साहित्य के पुरोधा ख्यातनाम साहित्यकार नानूरामसंस्कर्ता सही मायने में लोक के आलोक थे.…Continue

 

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लोक के आलोक : नानूराम संस्कर्ता

लोक के आलोक : नानूराम संस्कर्ता(पुण्यतिथि २५ नवम्बर पर विशेष)आधुनिक राजस्थानी साहित्य के पुरोधा ख्यातनाम साहित्यकार नानूराम संस्कर्ता सही मायने में लोक के आलोक थे. 21 जुलाई1918 को खारी में जन्मे नानूराम संस्कर्ता ने जीवन पर्यन्त गांव में रहकर…
Nov 24, 2011
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लोक के आलोक : नानूराम संस्कर्ता

लोक के आलोक : नानूराम संस्कर्ता(पुण्यतिथि २५ नवम्बर पर विशेष)आधुनिक राजस्थानी साहित्य के पुरोधा ख्यातनाम साहित्यकार नानूराम संस्कर्ता सही मायने में लोक के आलोक थे. 21 जुलाई1918 को खारी में जन्मे नानूराम संस्कर्ता ने जीवन पर्यन्त गांव में रहकर साहित्य-साधना की. उनकीरचनाएं ग्रामीण जिन्दगी के सुख-दुख तथा आकांक्षा व अवरोधों…See More
Nov 24, 2011
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मेरे शब्दों को आदरणीय वाजपेयी जी का आशीर्वाद....

किताबमुझे मेरी भाषा चाहिए : ''म्हारै पांती री चिंतावां'''मायड़ भासा' राजस्थानी आंदोलन के पुरोधाओं की विचारसरणि  पर जिन कवियों और लेखकों ने राजस्थानी रचनाओं से साहित्य को समृद्ध किया है, उनमें एक नया नाम और जुड़ा है, मदन गोपाल लढ़ा का। उनकी ताजा रचना 'म्हारै पांती री चितावां' कमला गोइंका फाउंडेशन से पुरस्कृत और प्रकाशित है।  इसमें कुल ८६ रचनाएं संकलित हैं। राजस्थानी की क्षेत्रीयता पर उंगली रखने वालों को चुनौती देते हुए लढ़ा ने पुस्तक के आरंभ में ही घोषणा की है, कि मेरी कविता (गुवाडी रो धरम) सब कुछ…See More
Aug 26, 2011
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सवाल..

निश्चय ही अन्ना जी ने देश को इस गंम्भीर मुद्दे पर जगाया है मगर जब देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ़ लोगों में इतना ज्यादा आक्रोश है तब इतना भ्रष्टाचार क्यों है. आर्थिक भ्रष्टाचार के साथ अन्य रूपों पर भी बहस होनी चाहिए. See More
Aug 26, 2011
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Aug 26, 2011
Ashok Kumar Singh replied to MADAN GOPAL LADHA's discussion जान बचाना बन गया जीवन का मकसद
"सेवा में , भंवर लाल जी, सादर प्रणाम आपकी खोज और प्रयास तथा उसके उपरांत जो यंत्र बनाया है, उससे अब तक जितनों का कल्याण किया है, वह एक दिन अवश्य रंग लाएगा। आप निराश न हो, तथा उपकरण को इंडस्ट्रीयल प्रोडक्ट के रूप में मार्केट में लाने का प्रयास करे। इस…"
Mar 27, 2011
tee kay marwah replied to MADAN GOPAL LADHA's discussion तंगहाली में सिसकती जिन्दगी
"badi hi marmik veytha he uske yahan deri jarur he par andher nahi mere sathi bhai jo bhi is pariwar ki madad ka mamla uthainge main sath hun sadev"
Feb 25, 2011
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जान बचाना बन गया जीवन का मकसद

जहांचाह होती है वहां राह अवश्य मिलती है। बुलंद हौसलों के आगे सारे अभाव बौनेसाबित हो जाते हैं । पंचायत समिति लूणकरनसर के ग्राम खारबारा के निकट चक १एसएलडी निवासी ३७ वर्षीय भंवरलाल सुथार इसका प्रबल प्रमाण है। महज पांचवी तकपढ़े-लिखे भंवर लाल ने खेती बाडी व लकड़ी का काम करते-करते बोरवेलों में गिरेलोगों की जान बचाने वाला एक…See More
Feb 13, 2011
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लोक के आलोक : नानूराम संस्कर्ता

लोक के आलोक : नानूराम संस्कर्ता                                    (पुण्यतिथि २५ नवम्बर पर विशेष)आधुनिक राजस्थानी साहित्य के पुरोधा ख्यातनाम साहित्यकार नानूरामसंस्कर्ता सही मायने में लोक के आलोक थे. 21 जुलाई1918 को खारी में जन्मेनानूराम संस्कर्ता ने जीवन पर्यन्त गांव में रहकर साहित्य-साधना की. उनकीरचनाएं ग्रामीण जिन्दगी के सुख-दुख तथा आकांक्षा व अवरोधों का प्रामाणिकदस्तावेज है.देहात की दुनिया का शायद ही कोई ऐसा कोना बचा होगा , जो उनकीपारखी निगाहों से छूट गया हो.यह उनका अनुभव किया हुआ सच है, जो…See More
Nov 25, 2010
MADAN GOPAL LADHA left a comment for Rajinder Katoch
"सम्माननीय राजेन्द्र जी, इस विषय में मदद हेतु आपकी पहल के लिये आभार. गुड्डी देवी का परिवार बीकानेर जिले की लूनकरनसर तहसील के गांव मलकीसर के पास एक ढाणी में रहता है. उनको विधवा पेंशन व उनके बेटे को विकलांग पेंशन मिल सकती है. सरकारी मदद से उसके बेटे के…"
Nov 24, 2010
Rajinder Katoch replied to MADAN GOPAL LADHA's discussion तंगहाली में सिसकती जिन्दगी
"मित्र मदन जी, में कोई वायदा तो नहीं करता, पर मुझे इस परिवार का पूरा प्रोफाइल भेजो. यह भी लिखना की कौन सी सरकारी योजना के अंतर्गत इन्हे क्या क्या सरकारी सहायता मिल सकती हे. कहाँ के रहने वाले हे इत्यादि. मगर परिवार को मेरे बारे में ना बाते. इनकी और…"
Nov 23, 2010
BHARAT BHARDWAJ replied to MADAN GOPAL LADHA's discussion तंगहाली में सिसकती जिन्दगी
"bhai madan ji samsyai to aati jaati rahti hai. ek patrakar hone ke nate or manavta ke chlte hum sabhi patrakaro ko unke sahyog me utarne ki jaroorat hai... is samsya par mukhyamantri ji se bhi baat ki jayegi.."
Nov 21, 2010
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तंगहाली में सिसकती जिन्दगी

लूणाराम वर्मा मेरे मित्र हैं आप पेशे से पत्रकार हैं और एक राष्ट्रीय स्तर के दैनिक से जुडे हैं. उनकी एक खबर ने मुझे हिला कर रख दिया. मीडिया क्लब के साथियो के लिये प्रस्तुत है यह खबर-तंगहाली में सिसकती जिन्दगी महाजन। दोनों हाथों से विकलांग बेटा, तीन बेटियां, इनमें दो शादी लायक, पूरे परिवार का पेट पालने की चिन्ता। रोटी के जुगाड़ के लिए महज डेढ़ बीघा कृषि भूमि। लूणकरनसर तहसील के पीपेरां-मलकीसर निवासी 44 वर्षीया गुड्डी देवी से राम तो रूठा ही, राज व समाज ने भी मुंह फेर लिया। सामने दु:खों के पहाड़…See More
Nov 21, 2010
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‘म्हारै पांती री चिंतावां’ पर पाठक मंच आयोजित

पीलीबंगा. 24 अक्टूबर। ‘कविता का कोई निश्चित सांचा नहीं होता। अंतस से निकली व विवेक से परिष्कृत कविता ही मानवीय संवेदना को बचा सकती है।’ ये विचार सुप्रसिद्ध राजस्थानी कवि ओम पुरोहित ‘कागद’ ने रविवार को अखिल भारतीय साहित्य परिषद व श्री जय लक्ष्मी साहित्य कला एवं नाटक मंच ·की ओर से आयोजित डॉ. मदन गोपाल लढ़ा ·के राजस्थानी ·विता संग्रह ‘म्हा्रै पांती री चिंतावां ’ पर पाठक मंच संगोष्ठी में व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि लढ़ा ·की कविताओं में अपने समय की जरूरी चिंताएं मुखरित हुई हैं। पाठ· मंच की अध्यक्षता…See More
Oct 25, 2010
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मातृभाषा राजस्थानी हो प्रारंभिक शिक्षा का माध्यम

मातृभाषा राजस्थानी हो प्रारंभिक शिक्षा का माध्यम- डॉ. मदन गोपाल लढ़ा -मातृभाषा राजस्थानी को प्रदेश के जन मन ने तो कलेजे में बसाया है लेकिन सत्ता के गलियारों में मायड़ का ‘हेला’ सदैव अनसुना रहा है। राजनीतिक उदासीनता के कारण ही आठ करोड़ लोगों की जबान अपने वाजिब हक के लिए तरस रही है। इधर शिक्षा का अधिकार कानून ने शिक्षा जगत में नई बहस छेड़ दी है। इस कानून के २९ वें अनुच्छेद में स्पष्ठ प्रावधान है कि बच्चों को उनकी मातृभाषा में प्रारंभिक शिक्षा का अवसर दिया जाए। शिक्षाविदों की भी राय है कि मातृभाषा में…See More
Jun 2, 2010
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चट्टानों की होड़ करते हौंसले

चट्टानों की होड़ करते हौंसलेमदन गोपाल लढ़ाकिसी ने सच ही कहा है कि हौंसले फ़तह की बुनियाद हुआ करते हैं. बीकानेर जिले के सूंई ग्राम का शिशुपाल सिंह इसकी मिसाल है. बुलंद हौंसलों के धनी शिशुपाल सिंह ने अपने जीवन से आदमी के जीवट को नई परिभाषा दी है. वर्षों पूर्व एक हादसे में रीढ़ की हड्डी टूट जाने के बावजूद उसने अपने मजबूत इरादों को नहीं टूटने दिया. वाकई उसकी जिन्दादिली को सजदा करने को जी करता है.उत्तर-पश्चिमी राजस्थान के रेतीले धोरों के बीच महाजन से २५ किमी दूर बसे सूंई ग्राम का बासिन्दा शिशुपाल सिंह…See More
Apr 17, 2010

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मेरे शब्दों को आदरणीय वाजपेयी जी का आशीर्वाद....

Posted on August 26, 2011 at 11:12pm 0 Comments

किताब



मुझे मेरी भाषा चाहिए : ''म्हारै पांती री चिंतावां''



'मायड़ भासा' राजस्थानी आंदोलन के पुरोधाओं की विचारसरणि  पर जिन कवियों और लेखकों ने राजस्थानी रचनाओं से साहित्य को समृद्ध किया है, उनमें एक नया नाम और जुड़ा है, मदन गोपाल लढ़ा का। उनकी ताजा रचना 'म्हारै पांती री चितावां' कमला गोइंका फाउंडेशन से पुरस्कृत और प्रकाशित है।  इसमें कुल ८६ रचनाएं संकलित हैं। राजस्थानी की क्षेत्रीयता पर उंगली रखने वालों को चुनौती देते हुए लढ़ा ने पुस्तक के आरंभ में ही घोषणा की है, कि मेरी कविता… Continue

व्यंग्य

Posted on March 22, 2010 at 10:08pm 0 Comments

जुगाड़ से तो चल रहा है देश



डा. मदन गोपाल लढ़ा



गत दिनों अखबार के पहले पन्ने पर ‘अब नहीं दिखेंगे सडक़ पर जुगाड़’ खबर पढ कर झटका-सा लगा। मुश्किल यह है कि यह माननीय न्यायालय का फैसला है, जिस पर कुछ भी बोला जाना अनुचित है। मगर इस खबर ने मेरे जैसे कलम घिस्सुओं के मन में हजारों सवाल तो खड़े कर ही दिए हैं। जुगाड़ से ही तो देश चल रहा है। क्या जुगाड़ पर प्रतिबन्ध किसी भी कोने से उचित है? खैर उचित-अनुचित की छोडि़ए, मुझे तो यह असंभव-सा लगता है। हालांकि कानूनन जुगाड़ पहले से ही अवैध है।… Continue

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