दादा अन्ना ने पत्र में मनमोहन सिंह को लिखा की इस देश में लोकतंत्र और संविधान नाम की कोई चीज नहीं बची तो कैसे फहराएंगे आप लाल किले पर तिरंगा. मनमोहन जी को बुरा लग गया. भाई बुरा भी क्यूँ ना लगे, साल में एक बार लाल किले पर तिरंगा फहराने का मौका मिलता है और प्रधान मंत्री के कार्यकाल में ये एक सुनहरा अवसर होता है. ऐसे अवसर पर भी लोग नजर लगायें ये अच्छी बात थोड़े ही ना है. मनमोहन सिंह ने बुरा मान लिया और गुप्पा फुला कर बैठ गए. कहा की जो भी बात करनी हो धरना प्रदर्शन के बारे में वो दिल्ली पुलिस से बात करो, मेरे जिम्मेवारी में ये सब नहीं आता. लो भाई, एक प्रधानमन्त्री के जिम्मेवारी में तो पूरा देश आता है, पूरा प्रशासन आता है, फिर ये दिल्ली पुलिस किस खेत की मुली है ? हाँ ये बात और है की अगर भ्रष्टाचार के आरोप में दिल्ली पुलिस रोबेर्ट वढेरा को थाने पर बिठा लेती तो मनमोहन सिंह के जिम्मेवारी के अंतर्गत दिल्ली पुलिस आ जाती.
हाँ तो मनमोहन सिंह ने फुलाया गुप्प और नाराज हो गए. अब सोचने वाली बात ये है की तिरंगा फहराने को अधिकार किसको दिया जाए ? ये देश प्रजातान्त्रिक है, इस देश की प्रजा ही इस देश की राजा है, वही अपना नेता चुनकर अपने बीच के लोगों को संसद में भेजती है और वही लोग प्रधानमन्त्री को चुनते हैं. यही चुना हुआ व्यक्ति देश के लाल किले पर तिरंगा फहराता है. भाई, देश प्रजा का, देश का नेता भी प्रजा का और इस देश का झंडा भी प्रजा का और उसको फहराने वाला भी प्रजा का. ये बात और है की देश की जनता जे संसद में गुलाब भेजा था लेकिन अब वो कुर्सी मिलते ही बिखर गए और उनमें सिर्फ कांटे बच गए तो ये जनता का दोष है ? जनता तो इनको अब पांच साल के बाद ही सबक सिखाएगी लेकिन इस बीच में क्या ? पांच साल के पुरे ना होने की स्थिति में क्या ? इसका मतलब ये की चोर-डकैत के नेता को देश का पवित्र झंडा छूने दिया जाए ? उनको लाल किले पर फहराने की बात दो दूर की गोटी ठहरी.
मनमोहन सिंह को दादा अन्ना के बातों का बुरा नहीं मानना चाहिए था, अन्ना ने वही बात कही जो देश की जनता कह रही है. मनमोहन सिंह को अन्ना और जनता के भाव को समझना चाहिए था की देश की जनता आज इतनी आहत हो चुकी है की मनमोहन सिंह को देश का झंडा तक छूने की इजाजत नहीं देना चाहती. अगर मनमोहन सिंह को इतना ही बुरा लगता है तो उस दिन बुरा नहीं लगेगा अगर उनको गुरद्वारे में जूते साफ़ करने की सजा दे दी जाए ? तब शायद ना लगे क्यूंकि बात उनके समाज की हो जायेगी और धर्म की हो जायेगी. तो क्या मनमोहन सिंह के लिए देश से ज्यादा सर्वोपरी धर्म है ? अगर उनके लिए देश से ज्यादा सर्वोपरी धर्म है तो फिर वो प्रधान मंत्री कैसे बने बैठे हैं ? जो जनता की भावनाओं को नहीं समझ पा रहा वो देश का प्रधान मंत्री कैसे बना बैठा है ? उसको तो नैतिक जिम्मेवारी लेते हुए अपना त्यागपत्र सौंप देना चाहिए.
मैं दादा अन्ना की बात को दुहराते हुए फिर से कहूँगा की मनमोहन सिंह को लाल किला पर झंडा तो क्या, उस तिरंगे को अपने गंदे हाँथ से छूना तक नहीं चाहिए क्यूंकि ये वो प्रधान मंत्री हैं जो देश की जनता को बरगलाकर, धोखा देकर प्रधान मंत्री तो बन गए हैं लेकिन इन्होने ने जनता के विश्वास के साथ धोखा किया है और भुखमरी से, बिमारी से, बेरोजगारी से आहत होकर मरने वालों के खून से अपने हाथों को रंग लिया है. ये वो हाथ हैं जिन्होंने इस देश के कई बच्चों को खिलौनों से मसरूफ कर दिया है, ये वो हाथ हैं जिन्होंने इस देश के जनता के मूंह से निवाला छीन लिया है, ये वो काले हाँथ है जिन्होंने इस देश को बेचने की कोशिश करने वालों के सर पर ताज पहनाया है और उनको बचाने की कोशिश की है. ये वो हाथ हैं जिन्होंने जनता की आवाज को तानाशाही तरीके से बंद करने की कोशिश की है.....क्या इन हाथों को देश का गर्व कहे जाने वाले तिरंगा को छूने का अधिकार दिया जा सकता है ? अरे, ये तिरंगा तो वो तिरंगा है जिसको अपने शरीर से लगाकर अंतिम यात्रा करने के जज्बे से इस देश के रक्षक अपनी जान तक न्योछावर कर देते हैं. मनमोहन सिंह क्या जानेंगे इस तिरंगे के महत्व को, उनके लिए तो शायद ये तिरंगा भी सोनिया गाँधी के सारी के पल्लू का एक हिस्सा से ज्यादा कुछ भी नहीं, यही कारण है की वो सबकुछ जानबूझ कर भी इस तिरंगे को छूने की हिमाकत और साहस करने से बाज नहीं आ रहे हैं.
आखिर अन्ना दादा ने ये कह ही दिया की "आप कौन सा मूंह लेकर तिरंगा फहराएंगे" तो ये कौन सा गुनाह कर दिया. ये बात तो देश की हरेक जनता कह रही है. हाँ ये बात और है की मनमोहन सिंह गूंगे तो थे ही अब बहरे भी हो चुके हैं. शायद इसीलिए उनको जनता की आवाज नहीं सुनाई देती. शायद अब दिमाग भी काम नहीं कर रहा है इसलिए उनको इस देश की मान और तिरंगे के शान की समझ भी नहीं रही.
बेहतर होगा मनमोहन सिंह जी की आप उस तिरंगे से दूर ही रहे, वो आपके भ्रष्टाचारी हाथों से गन्दा हो जाएगा. जो लोकतंत्र का मान रख सके, जो संविधान का ज्ञान रख सके, जो राष्ट्रभक्त हो और जो जनता का सच्चा सेवक हो, वो उस झंडे को छुवे तो उसका मान बढ़ता है. हाँ ये बात और है की सत्ता के नशे में चूर होकर आप कुछ भी करें, कोई रोकेगा थोड़े ही ना, क्यूंकि सरकार आपकी है, प्रशासन आपका है.....लेकिन....ये ध्यान रखियेगा....ये देश आपका नहीं रहा और ना ही इस देश की जनता आपकी रही, क्यूंकि आपने खुद अपने कुकृत्यों के साबुन से देश और जनता के वजूद को अपने दामन से धो डाला है.