सेवा में, माननीया, श्रीमती अंबिका सोनी जी, सूचना और जनसम्पर्क मंत्री, भारत सरकार। मैं यह पत्र आपको इसलिए लिख रहा हूँ क्योंकि मेरे पास कोई और रास्ता नहीं है कि मैं अपनी और अपने जैसे हजारों युवाओं की समस्या को लेकर कहीं और जाउं। मैं पेशे से एक पत्रकार हूं और दिल्ली में ही एक न्यूज चैनल के दफ्तर में काम करता हूँ। हालांकि मुझे पता है कि आपसे या सरकार से कुछ छिपा नहीं है फिर भी मैं अपने जैसे उन युवाओं की समस्या से अवगत करना चाहता हूं, जो न्यूज चैनलों और अखबार के दफ्तरों में हर रोज शोषण का शिकार होते हैं।
क्या इस देश मे मीडिया के पुराने कानूनों में संसोधन करके कुछ नए कानून नहीं बनाए जा सकते? आज मीडिया एक ऐसी इंडस्ट्री बन गई है, जो शोषण का प्रतीक बन चुकी है। निचले स्तर के कर्मचारियों की इतनी बुरी हालत है कि वो बयान नहीं किया जा सकता। यहां एक नई नीति बन गई है "कम लोग, कम सेलरी पर गधों की तरह कम करो"। आज मीडिया और राजनीति एक दूजे के पूरक बन गए हैं, राजनीति में जिस तरह परिवारवाद बढ़ते जा रहा है वही हाल मीडिया का हो गया है। यहां नौकरी पाने का फंडा बिल्कुल उल्टा हो गया है, ‘आप क्या जानते हो' ये कोई नहीं पूछता 'आप किसको जानते हो‘ ये पूछा जाता है। बड़े पदों पर बैठे लोग प्रबंधन के साथ मिलकर मलाई खा रहे हैं और निचले स्तर के कर्मचारी सुखी रोटी के लिए तरस रहे हैं।
सेलरी का आधार ये है कि बड़े अधिकारी अपने सगे-संबंधियों को मनमाना वेतन दिलाते हैं, चाहे उसे कुछ नहीं आता हो, और जिनकी किस्मत अच्छी है उन्हें कैसे भी करके नौकरी तो मिल रही है, लेकिन सेलरी में जमीन आसमान का फर्क हो जाता है। मैं कुछ दिनों पहले एक नए चैनल के दफ्तर में इंटरव्यू के लिए गया था, वहाँ मुझे जॉब तो मिल रही थी लेकिन सेलरी उतना ही ऑफर किया गया जितना मुझे मिलता है। मुझे प्रबंधन के बजट का हवाला दिया, जबकि मेरे साथ पास आउट हुआ मेरा मित्र जब एक हफ्ते बाद वहीं पर सिफारिश लेकर गया तो उसे तीन गुना सेलरी ऑफ़र किया गया, जबकि उसे भी उतना ही अनुभव था जितना मुझे है। यहां सिर्फ उन्हीं लोगों की नौकरी सुरक्षित है जो किसी की सिफारिश से आए हों या जिनको चमचागीरी करने आता हो, बाकियों की तो नौकरी भी हर समय खतरे में रहती है, पता नहीं कब किस बहाने निकाल दिया जाएगा।
नौकरी के लिए लोग 1-1 साल तक फ्री में इन्टरन्शिप करते हैं फिर भी परिवारवाद की वजह से नौकरी मिलना मुश्किल हो गया है। कई टैलेंटेड लोग एक मौके की तलाश में दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं। कुकुरमुत्ते की तरह उगे मीडिया संस्थानों के लुभावने और फरेबी विज्ञापन युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। जितने प्राइवेट संस्थान हैं, लगभग सभी प्लेसमेंट की गारंटी लेकर लाखों की कमाई कर रहे हैं और उनके फर्जीवाड़े के खिलाफ सरकारी महकमा भी मीडिया के डर से कोई कार्रवाई नहीं करता। मीडिया संस्थान अंधाधुंध पैसे बटोर रहे हैं और पत्रकार बनाने का सपना दिखाकर युवाओं से ठगी कर रहे हैं। कुछ बड़े चैनलों और अखबारों को छोड़कर बाकी सबका यही हाल है।
पिछले कुछ सालों मे जितने भी नए चैनल या अखबार लॉंच हुए उनके मालिकों का पत्रकारिता से दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं है। ये चैनल या तो किसी बिल्डर के हैं या किसी कॉर्पोरेट घराने के, जो इस मंशा के साथ न्यूज मीडिया मे कदम रख रहे हैं कि मीडिया के डर से कोई सरकारी महकमा उनकी काली कमाई पर डंडा ना चला सके और वे मीडिया की आड़ में काली कमाई करते रहे। चैनल मालिकों के साथ मिलकर जो बड़े अधिकारी हैं वो तो मालामाल हो रहे हैं और प्रबंधन को कम पैसे में स्टाफ दिलाने की बात करके खुद की सेलरी बढ़वा लेते हैं। अपने जानने वालों को अच्छी पोस्ट अच्छी सेलरी दिलाते हैं, बाकी सबको कोल्हू का बैल समझकर हाँकते रहते हैं।
मजबूरी यह है कि हम नौकरी छोड़ नहीं सकते क्योंकि हालत बहुत बुरे हो चुके हैं, जो इस इंडस्ट्री में कई सालों से टिके हुए हैं वे किसी और इंडस्ट्री में जाएं कैसे? उनके पास इतना समय है नहीं की वो किसी और फील्ड में अपने करियर की नई शुरुआत करें। यहां सैलरी का कोई पैमाना नहीं है सालों की मेहनत, समय और पैसा गंवाने के बाद लोग 4000-5000 की नौकरी करने को मजबूर हैं, क्योंकि प्रबंधन को इतने ही पैसे में कोई दूसरा स्टाफ मिल जाएगा। चैनल के अधिकारी अपनी और अपने चहेतों की सेलरी बढ़वाते हैं, बाकियों से उनका कोई लेना देना नही है। बहुत सारी समस्याएं हैं, जिनको मैं पत्र के माध्यम से नहीं बता सकता। आपसे सिर्फ इतनी गुजारिश है कि कुछ बिंदुओं पर विचार किया जाए। जैसे-
1. समान अनुभव, समान वेतन और वेतन का एक पैमाना तय किया जाए।
2. नौकरी की सुरक्षा को लेकर कोई कानून बने (बिना किसी आधार के किसी को नौकरी से ना निकाला जाए)।
3. कर्मचारियों के शिकायत निवारण के लिए सरकार सीधे हस्तक्षेप करे।
4. नौकरी देने का आधार तय किया जाए।
5. मीडिया संस्थानों पर गलत आश्वासन और दुष्प्रचार करने के लिए उनके ऊपर कार्रवाई की जाए ( नामांकन के समय मार्केट की स्थिति का सही विवरण दिया जाए)।
ये पत्र मैं अकेले नहीं लिख रहा हूं। मेरे जैसे हजारों पत्रकारों की यह विनती है आपसे की इस पर तत्काल विचार किया जाए। क्योंकि स्थिति हर दिन भयावह होती जा रही है। इस पत्र की एक-एक कॉपी मैं एनबीए और बीईए को भी भेज रहा हूं और उनसे निवेदन करता हूं कि वे भी इसपर विचार करें। सिर्फ सिफारिश के बदौलत नौकरी की प्रथा को बंद की जाए और मीडिया मे बढ़ रहे परिवारवाद को खत्म करने का एक सार्थक प्रयास किया जाए ताकि टैलेंटेड लोगों को मौका मिल सके, जिससे मीडिया के गिरते शाख को बचाया जा सके और मीडिया कर्मचारी हतोत्साहित होने के बजाए उत्साहित होकर कम कर सकें। हम इस पत्र के जवाब की उचित कार्रवाई की अपेक्षा आप सब से करते हैं।
आपक
[B]एसके चौधरी[/B]
पत्रकार
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