हम भारतीयों की आदत है कि हम काम टालते हैं. इतनी जल्दी क्या है, व़क्त आने पर कर लेंगे. इस मनोविज्ञान का सहारा लेकर योजना ही ऐसी बनाई गई कि काम खेलों की शुरुआत होने तक चलता रहे. उस स्थिति में तय बजट से ज़्यादा पैसा आसानी से ख़र्च करने के लिए मिल जाएगा और कोई सवाल भी नहीं उठाएगा. यही हुआ भी. जितना पैसा इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए दिल्ली सरकार ने मांगा, केंद्र ने दिया, पिछला पैसा कहां ख़र्च हुआ, इसके बारे में पूछा भी नहीं. दिल्ली सरकार की पहली दुश्मन बरसात रही. अगर बरसात दिल्ली में न होती और लोग गर्मी से तरसते रहते तो शायद निर्माण कार्य में घपले का सवाल इतनी जल्दी नहीं उठता, क्योंकि तब निर्माण में खामियों, घटिया सामान के इस्तेमाल का पता ही नहीं चलता. तब सवाल उठता कि काम समय से पूरा नहीं हो पा रहा, इसलिए और पैसे लगाओ. वसंत कुंज में बनने वाले खिलाड़ियों के फ्लैट तैयार नहीं हैं, पहले वहां बीस इंजीनियर भी नहीं लगे थे, अब जल्दी पूरा कराने के लिए सौ से ज़्यादा इंजीनियर लगाए गए हैं.
क्यों सड़कें टूट रही हैं, कहां छत टपक रही है और कहां टाइल्स उखड़ रही हैं, अब इन सवालों का कोई फायदा नहीं, क्योंकि सरकार ने देशप्रेम या देश के सम्मान के साथ खेलों का आयोजन जोड़ दिया है. अब अगर कोई कितनी बड़ी घपलेबाज़ी करे और उसे देश के सम्मान के साथ जोड़ दे तो हमें ख़ामोश रहना चाहिए. इसीलिए कोई बड़ी जांच नहीं होगी, जांच के नाम पर लीपापोती होगी. सांप निकल जाने के बाद ज़ोर-ज़ोर से लकीर पीटी जाएगी. खुला सत्य है कि पैंतीस हज़ार करोड़ इंफ्रास्ट्रक्चर में ख़र्च किए गए, जिसमें से तीस प्रतिशत राजनैतिक टैक्स के रूप में चला गया और बीस प्रतिशत काम करने वाली कंपनियों ने अपने मुनाफे के रूप में रख लिया. केवल सत्रह या अट्ठारह हज़ार करोड़ रुपये ही सारे प्रोजेक्ट में ख़र्च हुए हैं. ज़रूरत इस बात की है कि कुछ बड़े इंजीनियरों की कमेटी बने और वह सारे काम का जायज़ा लेकर बताए कि सचमुच ख़र्च कितना हुआ है. लेकिन यह होगा नहीं.
लापरवाही की हद कि कॉमनवेल्थ गेम्स विलेज में बेसमेंट में अस्पताल बनना था, इसकी डिज़ायन इस नफासत से की गई कि इसमें एंबुलेंस जा ही नहीं सकती. अब इसे गोदाम के काम में लाया जाएगा और तात्कालिक अस्पताल बाहर मैदान में टेंट में बनाया जाएगा, जिसे डेढ़ करोड़ के किराए पर जर्मनी से मंगाया गया है. दो हज़ार तीन में दिल्ली में कॉमनवेल्थ गेम्स होंगे, यह तय हुआ था, पर कोई तैयारी नहीं हुई. शायद दिल्ली की मुख्यमंत्री को भरोसा नहीं था कि पुनः वह सत्ता में आएंगी. वह सत्ता में आ गईं और असली काम दो हज़ार पांच या छह से शुरू हुआ. इसे क्या कहेंगे, देशभक्ति की यह कौन सी परिभाषा है और हमें देशभक्ति की कौन सी परिभाषा पढ़ाई जा रही है. शायद देशभक्ति या देशप्रेम या देश का सम्मान आम आदमी के लिए ही मायने रखता है, सत्ताधीशों, अफसरों और ठेकेदारों के लिए इसका कोई मतलब नहीं है.
उनचास मज़दूरों की जान काम के दौरान चली गई, सौ की जान मेनेन्जाइटिस की वजह से गई और सत्तर लापता हैं. आम भाषा में लापता भी मरा माना जाता है, पर चूंकि ये ग़रीब हैं, इसीलिए न इनकी मौत का सरकार को कोई दु:ख है, न मीडिया को और न इनके परिवारों को ही कोई मुआवज़ा दिया गया है. दरअसल इंसानी मौत तो कॉमनवेल्थ ख़र्चे का हिस्सा है ही नहीं. इसमें उन मौतों का हिसाब ही नहीं है, जो खुले गड्ढों, नालों में कार सवारों, पैदल चलते आदमी के गिरने से हुई हैं. हमें पूरा भरोसा है कि कॉमनवेल्थ गेम्स होंगे, भले ही खिलाड़ी दूसरे या तीसरे दर्जे के आएं. इनका मुक़ाबला भी भारतीय खिलाड़ी कर पाएंगे या नहीं, कह नहीं सकते, क्योंकि अभी तक टीमें फाइनल नहीं हुई हैं. कहां किसकी ट्रेनिंग हो रही है, किसी को नहीं पता. अगर खिलाड़ी जीतते हैं तो इसमें उनका अपना जज़्बा होगा, सुविधाओं का कोई रोल नहीं होगा. संसद में कॉमनवेल्थ गेम्स को लेकर चर्चा हो रही थी, खेलमंत्री ने अपने उत्तर में कहा कि अगर किसी को जानकारी चाहिए तो वह सूचना के अधिकार का प्रयोग करे. खेलमंत्री गिल ज़िंदगी भर नौकरशाह रहे. उन्हें संसदीय गरिमा का भी नहीं पता, न संसद की सर्वोच्चता और पवित्रता का. उन्होंने गर्व से संसद को छोटा बना दिया, जिस संसद ने सूचना के अधिकार का क़ानून बनाया. अफसोस तो लोकसभाध्यक्ष के ऊपर होता है, जिन्होंने गिल को डांटा नहीं और संसदीय गरिमा का ध्यान नहीं दिलाया.
अब आते हैं प्रधानमंत्री और सोनिया गांधी के वायदे के ऊपर कि खेल समाप्त होने के बाद भ्रष्टाचार की जांच होगी. भरोसा कर लेते हैं, लेकिन मन नहीं मानता. आख़िर क्या हुआ पांच हज़ार करोड़ रुपये का, जिसे विदेशी बैंकों ने देश से बाहर भेज दिया. क्या हुआ यूटीआई घोटाले का और क्या हुआ आईपीएल का. इतना शोर, लगभग साबित कि ग़रीब आदमी के पैसे से सट्टेबाज़ी कर कुछ लोग, जिनमें मंत्री और सांसद भी शामिल हैं, मालामाल हो रहे हैं, सारा मामला दाख़िल दफ्तर, वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी ने संसद में आश्वासन दिया था कि सारी जांच गहराई से और खुली होगी. केवल मोदी को हटाने के अलावा कुछ नहीं हुआ, वह भी इसलिए, क्योंकि उसने शरद पवार से लड़ने की हिमाकत कर डाली थी. इसलिए कॉमनवेल्थ की जांच नहीं होगी, यह मानने के अलावा कोई चारा नहीं है. पर क्या इस भ्रष्टाचार को इसलिए भूल जाएं, क्योंकि इसे देश की इज़्ज़त के मखमल में लपेट कर किया जा रहा है. तो इसका मतलब यह हुआ कि आगे से अब बड़ा भ्रष्टाचार देश की इज़्ज़त के नाम पर होगा. और यह सब हो रहा है, जब देश में पीने का पानी नहीं है. किसान अपनी ज़मीन की वाजिब क़ीमत के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं और जान दे रहे हैं. गेहूं सड़ रहा है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट का सुझाव सरकार नहीं मान रही कि इसे सड़ाने की जगह ग़रीबों में बांट दिया जाए. क्या मान लें कि लालू यादव का आरोप सही है कि गेहूं जानबूझ कर सड़ाया जा रहा है, ताकि बीयर बनाने वालों को कौड़ियों के मोल दिया जा सके. प्रधानमंत्री और सोनिया गांधी दिल्ली में ही रहते हैं. अगर स़िर्फ दिल्ली में बरसाती पानी के संरक्षण पर सरकार गंभीर हो जाती तो कम से कम दिल्ली के पीने के पानी की समस्या कुछ तो हल होती. लेकिन जिस शहर में सड़कें पानी से भर जाएं स़िर्फ दो घंटे की बारिश की वजह से, देश की राजधानी के पानी के निकास के सारे रास्ते मिट्टी से भर जाएं और उनकी सफाई न हो, सारे शहर में गंदगी ही गंदगी हो और अधिकारी कहें कि डेंगू और मलेरिया का ख़तरा बढ़ गया है, वहां क्या हो सकता है. यह उस शहर का हाल है, जो देश की राजधानी है. सोनिया गांधी के घर के बाहर अकबर रोड पर घुटनों-घुटनों पानी था, जिसे उन्होंने देखा ज़रूर होगा. उन्हीं की पार्टी की मुख्यमंत्री कह रही हैं कि दिल्ली बेहतर हो रही है.
प्रधानमंत्री शायद समय न निकाल पाएं और शायद न समझ पाएं कि सरकार के इसी रवैये की वजह से देश में असंतोष बढ़ रहा है और लोगों का विश्वास डगमगा रहा है. देश एक नए किसान आंदोलन के मुहाने पर है, जिसमें किसान किसी का नेतृत्व नहीं मान रहा. राजनैतिक दल पीछे हैं और उनका रोल केवल समर्थन देने का बन गया है. किसान नेता माने जाने वाले लोग भी अप्रासंगिक हो रहे हैं. संयोग की बात है कि इसका केंद्र उत्तर प्रदेश बनता जा रहा है, जो दिल्ली से जुड़ा है. जाटों ने धमकी दी है कि अगर उन्हें आरक्षण नहीं मिला तो कॉमनवेल्थ के दौरान वे दिल्ली को जाने वाली सब्जियों और दूध की सप्लाई रोक देंगे. प्रधानमंत्री जागे, लेकिन बहुत देर से जागे. अगर साल भर पहले जाग जाते तो बहुत कुछ संभल जाता. लेकिन और समस्याएं खड़ी हो रही हैं, उनका क्या. अलीगढ़, मथुरा, आगरा और बलिया में अपनी ज़मीन के वाजिब हक और मुआवज़े के लिए लड़ रहे किसान तो नक्सलवादी नहीं हैं न, तब क्यों नहीं इनके प्रति सत्ता संवेदनशील बन रही? आप न संभलना चाहें तो न संभलें, पर अगर संभल जाएं तो अच्छा होगा.
अंत में फिर कॉमनवेल्थ, जयपाल रेड्डी ने ए के एंटनी को खत लिखा है कि खेलों को कराने के लिए सेना का इस्तेमाल किया जाए. नागरिक प्रशासन फ्लाप हो गया है. अब सेना से मलवा उठवाया जाएगा तथा सिपाही की ड्यूटी ली जाएगी. सीमा की रक्षा करने वाली सेना अब देश के उन कामों को करेगी, जिन्हें भ्रष्टाचार, बेईमानी और लूट की वजह से नहीं किया गया. यानी भ्रष्ट नेताओं, भ्रष्ट प्रशासन और भ्रष्ट ठेकेदारों को सेना के ज़रिए बचाया जाएगा और अंत में सेना के ऊपर भी भ्रष्टाचार का आरोप लगा दिया जाएगा. यह ख़तरनाक खेल है, जिसे सरकार खेलने जा रही है. न खेले तो अच्छा, लेकिन खेलेगी ज़रूर, क्योंकि उसे लोकतंत्र की साख से खेलने का शौक चर्रा गया है
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आप का सही कहना है....जब हमारी सरकार से दिल्ली ही नही संभल रही तो पूरा देश क्या कर पाएँगे..
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