अमर सिंह हुए पैदल : मुलायम ने छिनी साइकिल
सपा के पूर्व नेता अमर सिंह जी के भाग्य ने कुछ ऐसा चक्कर चला रखा है की बेचारे को कहीं ठौर तक नहीं मिल रही है. कहते हैं की व्यक्ति को अपनी जुबान और व्यवहार हमेशा मीठा रखना चाहिए, इंसान को किस इंसान की जरुरत पड़ जाए और कब किसके सहयोग की जरुरत हो जाये ये कोई नहीं जानता, इसीलिए कहते हैं की ये दुनिया गोल है और आप फिर से वही खड़े हो सकते हैं जहाँ से चले थे लम्बी यात्रा के बाद भी. किसी ने कहा है की जिंदगी एक प्लेटफार्म है और पुराने लोग कभी भी कहीं भी मिल सकते हैं. कहने का मतलब की जिसके साथ व्यव्हार जैसा रखेंगे उसके साथ भविष्य में मुलाकात और रिश्ता भी वैसा ही होगा. लेकिन अमर सिंह जी तो नेतागिरी के उस चरम को पा चुके थे की सोचा ही नहीं की राजनीती का पहाड़ एक ऐसा पहाड़ है जिसपर जाते तो लोग सीढियों से हैं लेकिन कभी कभी सीढियों से उतरने के बदले सीधा गिरना पड़ता है फिर जनता मलहम लगाने तक नहीं आती अगर जनता और दुसरे राजनितिक पार्टिओं से व्यवहार ठीक ना रहा हो तो.
अमर सिंह जी खूब बोले और खूब बोले, इतना बोले की हद ही पर कर गए बोलने के धून में. कभी सोनिया जी को "मल्लिका-इ-हिंदुस्तान" बोलकर कटाक्ष किया तो कभी किसी को कुछ बोलकर. ऊपर से मुलायम जी की शाबाशी ने उनका मन और बढ़ा दिया. फिर क्या था अमर सिंह जी मुलायम सिंह यादव जी को खुश करने के लिए दरवाजे पर बंधे कुत्ते की मानिंद भुक्ते रहे और मालिक से सौगात पाकर खुश होते रहे. कुछ दिन पहले तक तो लोगो ने अमर सिंह को "मुलायम का कुत्ता" का खिताब भी दे दिया. लेकिन कहते हैं की "धन का बढ़ना उतना घातक नहीं होता इंसान के लिए, जितना मन का बढ़ना घातक होता है"
आज अमर सिंह जी को मुलायम सिंह यादव ने अपनी साइकिल से धक्का देकर उतार दिया है, वो भी बीच सड़क पर और अमर सिंह जी पैदल हो गए. जिस साइकिल में कई बार चैन चढ़ाया, हवा भरवाई और मरम्मत कर कर के मुलायम जी के चलने लायक और गतिवान बनाने की कोशिस की, आज वो साइकिल उन्ही को मूंह चिढाती समय के हवा में फुर्र्र हो गयी. जीवनरूपी सड़क पर बेचारे अमर सिंह जी अपने सर पर हाथ रखकर अपनी किस्मत को रो रहे हैं. लेकिन मैं तो कहूँगा की अमर सिंह जी के लिए बेहतर होगा की अपने सर पर हाथ रखकर किस्मत को ना रोयें बल्कि अपनी मूंह पर उंगली रख कर अच्छे बच्चे की तरह बकवास ना करने की कसम लें. क्योंकि समय अच्छे दिन भी जरुर दिखायेगा और मूंह पर उंगली रही और बकवास नहीं किया तो अमर सिंह जी के दिन भी जरुर बहुरेंगे.
अमर सिंह जी आज पैदल है और कुछ छुट-भैये भी साथ हो गए हैं इस आशा के साथ की अमर अपनी कमाल जरुर दिखायेंगे लेकिन उन्हें क्या पता की जादूगर के छड़ी में कमाल नहीं था बल्कि उसका सम्मोहन था जो जनता और पार्टी को भ्रमित कर ऐसे ऐसे खेल दिखाए जिसकी सच्चाई का परिणाम उनके सामने है.
जुगाड़ विद्या और दलाली के माहिर खिलाड़ी, दलाल स्ट्रीट में शेयरों के बादशाह अनिल अम्बानी जैसे और भी कार्पोरेट घरानों के दोस्त कहे जाते थे. एक समय था की अमर सिंह जी फ़िल्मी दुनिया के नामी गिरामी अभिनेताओं और अभिनेत्रियों से घीरे रहते थे. एक समय था की उनके आगे पीछे हेलीकाप्टर का बेडा होता था, कारों का काफिला होता था और इन सबके साथ अमर सिंह जी का मुस्कुराता हुआ शातिर चेहरा होता था लेकिन आज वो सब सुख सपना हो गया और समय की धुल उनको एक एंटिक वस्तु के रूप में भी अपने पार्टी में न रख सकी और कूड़ा समझ क्र घर के बाहर निकाल दिया.
अमर सिंह जी चिल्लाते रहे और गुर्दे, फेंफडे का हिसाब किताब मांगते रहे लेकिन उनकी इस मांग में छुपी बेशर्मी प्रदेश की जनता ने मुस्कुराते हुए महसूस किया. अमर सिंह जी को अपने गुर्दे और फेंफडे की मांग मुलायम जी से करने से पहले ये सोचना चाहिए था की जिस प्रदेश की जनता उनपर विश्वास करती थी और दिलो जान से चाहती थी उसको छोर कर वो "बॉम्बे के बाबू" बन गए. एक बार हाल-चाल जान ने भी प्रदेश के जनता के पास नहीं पहुंचे. उनको बिग-बी के घर की तीमारदारी पसंद थी लेकिन जनता की सेवा उनके गले नहीं उतर रही थी. जनता ने जिसपर विश्वास किया उस व्यक्ति के विश्वासघाती चरित्र से प्रदेश के कितने लोगो का फेंफडे और गुर्दे ख़राब हुए चिंता में, इसका हिसाब किताब भी अमर सिंह जी देखने की कोशिस करते तो भलमनसाहत होती. जनता भोली है देर से समझती है, भ्रमित रहती है लेकिन बेवकूफ कदापि नहीं है. जनता को अगर बेवकूफ बनाया जा सकता है तो अधिक से अधिक ५ साल तक और उसके बाद शायद नहीं. आज जनता के दर्द को समझते हुए और पार्टी के हित को देखते हुए सपा ने इन्हें धक्का देकर बाहर निकाला. क्योंकि सपा में इनके रहने से विद्रोह की स्थिति थी और सपा के कर्मठ कार्यकर्त्ता और नेता इनके बम्बयिया-रवैये से काफी खफा थे.
कहते हैं इंसान के अन्दर ताकत, पैसा और शोहरत आ जाए तो अपने को भगवान नहीं समझना चाहिए लेकिन अमर सिंह जी ने अपने आप को सपा का कर्णधार और भगवान समझ लिया. लेकिन कई दिनों के वाद-विवाद और कई नेताओं के अन्दर अन्दर फोड़ने और परेशान करके पार्टी से बाहर का रास्ता दिखने को विवश करने वाले व्यक्ति को सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने देर से ही सही लेकिन पहचान लिया और सपा की बिमारी भी पता चल गयी और उसका इलाज भी हो गया. अब सपा अपने आप को स्वस्थ करने में लगी है, नए तरीके और नए ताकत के साथ.
सपा के मुखिया मुलायम सिंह आज अपने बिखराव को समेट कर नयी ताकत, नयी योजना, नए मनोबल के साथ आगे बढ़ने की कोशिस कर रहे हैं. आज सपा लगातार सभा कर रही है और उधर अमर सिंह जी भी लगातार सभा का आयोजन करके क्षत्रिय-जाति के नाम पर राजनीती का नया चूल्हा सुलगाना शुरू कर दिया है. लेकिन मुलायम सिंह यादव अब पहले जैसे नहीं रहे और अब राजनीती का पाशा उन्होंने अपनी हाथ में ले लिया है और खुद खेलने को तैयार है. जबकि ये पाशा पहले अमर सिंह के पास था और वो अपने मन से जैसे तैसे खेल खेल कर सपा का सत्यानाश कर दिया. मुलायम सिंह ने अपनी योजना और पाशा को तैयार किया और राजनीती की गोटी बढ़ा ली. आज उन्होंने अमर सिंह का विकल भी ढूंढ निकाला जो अमर सिंह को ही काफी महंगा पड़ने वाला है. क्योंकि अमर सिंह जो क्षत्रिय-राजनीती का चूल्हा फूक फूक कर सुलगाने की कोशिस कर रहे थे उसके ऊपर भी मुलायम पानी डालने से नहीं चुके. मुलायम सिंह ने अमर सिंह का विकल्प ढूंढ निकला "रघुराज" के रूप में, जी हाँ वही रघुराज जो अख़बारों के सुर्ख़ियों में "राजा भैया" के नाम से शुमार रखते हैं और उत्तर प्रदेश की राजनीती में क्षत्रिय समाज में इनकी तूती बोलती है. राजा भैया की प्रदेश के क्षत्रिय समाज में एक दबंग की या चाटुकार की नहीं एक आदरणीय भूमिका है. प्रदेश का क्षत्रिय समाज "राजा भैया" के नाम की जैकार करता है और गौरवन्वित होता है. कुंडा या प्रतापगढ़ तो क्या पूरा प्रदेश इनके नाम से वाकिफ है. हाँ अपराधिक पृष्ठभूमि से सुपोषित राजा भैया प्रदेश के हिस्टरी-शीटर भी माने जाते हैं लेकिन वहीँ उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री और बसपा की प्रमुख मायावती जी के निर्भीक प्रतिद्वंदी भी माने जाते हैं. शायद इन्ही सब कारणों से प्रदेश के अपने विधान सभा क्षेत्र से राजा भैया बिना किसी राजनितिक पार्टी के सहयोग के निर्दलीय के रूप में चुनाव लडते हैं और विजेता घोषित होते हैं.
अगर अमर सिंह का विकल्प मुलायम सिंह ने निकाल लिया है राजा भैया के रूप में तो ये अनुमान किया जा सकता है की अमर सिंह के हाथ क्षत्रिय-रथ की बागडोर निकल चुकी है क्योंकि प्रदेश का क्षत्रिय-समाज अमर सिंह से ज्यादा राजा भैया को जनता है और राजा भैया को मुश्किल वक़्त में भी अपने साथ पाता है. राजा भैया के मुकाबले अमर सिंह क्षत्रिय समाज में एक व्यक्ति के सिवा कोई पहचान नहीं रख पाएंगे. मुलायम सिंह ने अपना पहला पाशा ही राजनीती के बिसात पर ऐसा फेंका है जो अमर सिंह को तिलमिलाने के लिए काफी होगा.
जुगाड़ विद्या में माहिर कहे जाने वाले अमर सिंह और कई नेताओं और राजनितिक पार्टिओं की ओर आशान्वित होकर देख रहे हैं लेकिन उन्होंने धन कमाया, नाम कमाया, शोहरत कमाई लेकिन सब खोखली और व्यवहार तो कभी कमाया ही नहीं. आज अव्यवहारिक ना होने का ही नतीजा है की वो घाट-घाट की बात जोह रहे हैं और कोई राजनितिक पार्टी उनको अपनी और आते देखकर ही दरवाजा बंद करने को विवश है. अमर सिंह जी एक ऐसे छुवाछूत की बिमारी हो गए हैं राजनीती की दुनिया में की कोई इन्हें अपने पास भी फटकने नहीं देना चाहता.
सपा की साइकिल शायद अपनी रफ़्तार पकड़ने वाली है लेकिन दूर बहुत दूर अमर सिंह जी अपने भाग्य को कोसते रहेंगे और छूट-भैया नेताओं के कहने पर फिर से उल्टा सीधा निर्णय लेते रहेंगे.
बहुत शेर मैने सुने अमर सिंह जी के उत्थान के ज़माने में, लेकिन आज कुछ पंक्तियाँ उनके शान में अर्ज़ करना चाहूँगा कि --
सूरज को गुमान नहीं होता, की मेरे से जग उजियारा है.
चाँद को गुमान नहीं होगा, की मैं न रहू तो जग अँधियारा है.
ना जाने कुछ इंसान क्यों गुमान कर बैठते हैं
अपने को भगवान समझने लगते हैं
फिर सोचने लगते है की, ये दुनिया किसी और के बाप की नहीं
ये दुनिया जिसने भी बनायीं हो, लेकिन अब ये संसार हमारा है.
आर के पाण्डेय "राज"
लखनऊ