क्षुद्र राजनीती का खुनी खेल रहीं हैं केन्द्रीय रेल मंत्री ममता बनर्जी ?

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की सत्ता पाने की क्षुद्र लालसा का उदाहरण, लगातार हिंसक हमलो से सिद्ध हो रहा है. तृणमूल कांग्रेस की सुप्रीमो ममता बनर्जी ने यह कालिका रूप मानव के उद्धार के लिए नहीं बल्कि निरीहों के संहार के लिए लिया है और इसके लिए उन्होंने त्रिन्मुलियों और मओवादिओं को एकजुट कर लिया है. हिंसा में लिप्त तृणमूल के कार्यकर्ताओं और मओवादिओं को ममता जी कई बार परोक्ष रूप से और कई बार अपरोक्ष रूप से संरक्षण और सहयोग देती हुयी दृष्टिगत भी हुयी हैं. सीपीआई (एम्) के कार्यकर्ताओं पर लगातार हो रहे हिंसक हमले इस बात का उदाहरण है. ऐसा जघन्य कृत करने का बहुत ही क्षुद्र उद्देश्य लेकर चल रहीं हैं ममता बनर्जी और वो खुद्र उद्देश्य है--
"पश्चिम बंगाल की सत्ता पर काबिज होना."
माओवादिओं और तृणमूल कांग्रेस के हिंसक और दुर्दांत अपराधी प्रवृति के कार्यकर्ताओं के सहयोग से लोकसभा चुनाव में प्राप्त विजय से उनका कालिकरूप और अट्टहास कर रहा है और लगातार हिंसा का मार्ग अपनाते हुए पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री के पद के स्वार्थ हेतु और भी हिंसक और दुर्दांत वैचारिकता को प्रश्रय दे रहा है जो अत्यंत ही दुर्भाग्यपूर्ण और निंदनीय है क्योंकि निजी स्वार्थ और निजी महत्वाकांक्षा के पूर्ति के लिए इस तरह के प्रयास इस प्रजातांत्रिक देश में कहीं से उचित नहीं है और ना ही मानवता हीत में ही कहा जा सकता है. निरीहों पर हिंसक हमला करवाना और उसके लिए अपने कार्यकर्ताओं और माओवादिओं को प्रश्रय देना और प्रेरित करना कहीं से भी उनके स्त्री में पाए जाने वाला ममत्व भाव को नहीं बल्कि राक्षसी भाव को दर्शाता है. अगर हाल की निरीहों खुन रंगे हुए आंकड़ो को देखा जाए तो वर्तमान रेल मंत्री ममता बनर्जी के क्षुद्र राजनीति का खुनी खेल स्पष्ट हो जाता है और स्पष्ट हो जाती है उनकी क्रूर और क्षुद्र मंशा.
मिसाल के तौर पर २५ दिसम्बर २००९ को भुलाधरा के पार्टी शाखा सचिव रामेश्वर मुर्मू को मार डाला गया और इसके तीन दिन बाद ही यानी २८ दिसम्बर २००९ को कारेड कालिदान हेम्ब्रम की धारदार हथियार से गोदकर निर्मम हत्या कर दी गयी. फिर पुरुलिया जिले के धड़का गाँव में सीपीआई (एम्) की लोकल कमिटी के सचिव धानु रजक को गोली मार कर नृशंश हत्या कर दी गयी. फिर नए-वर्ष के प्रथम माह में ही ७ जनवरी २०१० को बाँकुड़ा जिला में माओवादिओं ने सीपीआई (एम्) की झिलिमिली लोकल कमिटी के सदस्य हरेन बास्के की हत्या कर दी.
ममता जी माओवादिओं के पक्ष में अब खुले आम बोलने भी लगी हैं और इसका स्पष्ट उदाहरण इस बात से लिया जा सकता है की, हाल ही में केंद्र सरकार और केन्द्रीय गृहमंत्री के द्वारा पश्चिम बंगाल में माओवादिओं के खिलाफ मोर्चा खोलने पर ममता जी ने भारत सरकार और केन्द्रीय गृह मंत्री के खिलाफ ही मोर्चा खोलते हुए कहा की-- "अर्धसैनिक बलों के माध्यम से माओवादिओं के खिलाफ मोर्चा खोलना ये दर्शाता है की भारत सरकार सीपीआई (एम्) के सामने आत्मसमर्पण कर रही है." उनका यह बयान हाल ही में लालगढ़ क्षेत्र में हुए अर्धसैनिक बलों के द्वारा काफी मात्र में माओवादिओं के खिलाफ मोर्चा खोलकर काफी संख्या में हथियार बरामद करने को लेकर भी था. अब ममता जी ने अपने तेवर को रंग दिखाते हुए यह घोषणा की है की माओवादिओं के खिलाफ अर्धसैनिक बलों का सहयोग लेने पर वो आन्दोलन छेड़ेंगी. भारत सरकार के द्वारा अर्धसैनिक बलों के माध्यम से माओवादिओं के खिलाफ खोले हुए मोर्चे के विरोध को ममता जी १६ जनवरी २०१० को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के दो महत्वपूर्ण कार्यक्रमों का पश्चिम बंगाल में बहिष्कार के माध्यम से दर्शायेंगी.
ममता जी की अर्धसैनिक बलों के खिलाफ मोर्चा खोलना और माओवादिओं का सहयोग आगे बढ़कर खुलेआम करना, ये स्पष्ट कर रहा है की वो हिंसक माओवादिओं के माध्यम से पश्चिम बंगाल के सत्ता पर खुनी होली खेलकर काबिज होना चाहती हैं और इसलिए लिए वो माओवादी आतंक और हिंसा का सहारा लेने से भी गुरेज नहीं करने वाली हैं.
अब देखना यह है की भारत में प्रजातंत्र के सत्ता पर काबिज युपीए सरकार, जिसमें ममताजी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस के के सदस्य भी शामिल हैं, क्या फैसला लेती है क्योंकि युपीए सरकार अपने धुल-मूल रवैये के कारण पहले से ही अपना विश्वास जनता के बीच खो चुकी है.
--आर के पाण्डेय "राज"
लखनऊ